Friday, February 12, 2010

घर का परिँदा

उस वक्त मैँ नवोदय विद्यालय के दसवीँ कक्षा का छात्र था ।अप्रेल के महिने
मेँ पढाई का कुछ ज्यादा टेँशन नही था और ना ही प्रशासन से उतना डर ।पुरी
तरह से आश्वस्त हो कर हमलोग रविवार को अपने-अपने घर भाग जाया करते थे ।
उस दिन मैँ भी घर आया था ,पर काफी दिनोँ बाद ।लगभग तीन चार महीनोँ के बाद
।घर मेँ कदम रखते के साथ ही मुझे टेँऽऽ..ऽटेँ.ऽऽटेँ.एंऽऽ और साथ मेँ दीदी
की मिली-जुली आवाज मीठुऽऽ..मीठु ऽआऽऽआ...ऽ कटोरेऽऽ सुनाई दी ।मैँ आवाज
सुनकर समझ गया की दीदी अपनी ख्वाहिश पुरी कर चुकी है ।उसकी इच्छा थी कि
घर मेँ एक तोता रहे जो अपने मधुर आवाज से हर किसी को रिझाता रहे ।
हालांकि मुझे भी काफी खुशी हुई ।पर मैँ चेहरे पर किसी तरह का भाव न लाया
...ऐसा मेरी आदत मेँ ही शामिल है ।मैँ जब खुश होता हुँ या फिर मैँ दु:ख
मेँ होता हुँ तो भी मेरा चेहरा NORMAL ही रहता है ।
मैँने तोते को बहुत करीब से देखा ,'एक मासुम निरीह सा प्राणी ,छोटा सा
किन्तु बहुत प्यारा ,अपने छोटे छोटे टांगो को मजबुती के साथ आगे बढाता
हुआ मेरे करीब से निकल गया ।उसमेँ कोई शिकन न थी और न किसी से डर ।हमारे
परिवार मेँ वह इस कदर शामिल था जैसे वह हमारे ही परिवार का एक सदस्य हो ।
मैँने उसे पकड़ने को हाथ बढाया तोऽऽतोऽउसका RESPONSE सबको हंसा देने को
काफी ता । पैरोँ को आगे न बढाकर वो पहले दायेँ पैर को दायीँ ओर बढाकर फिर
बायेँ पैर को भी उसी तरफ बढाकर हमसे कट सा गया ।पर थोड़ी दुर जाकर वह मुझे
आंखे तरेर कर देख रहा था और साथ मेँ उसकी टेँऽऽटेँऽ की आवाज ,पर थोड़ी
गुर्राहट के साथ ।मैँ भी उसकी इस अदा पर मुस्कुरा दिया ।