Thursday, January 28, 2010

दीपक...... बुझ गए ।।

किसी ने कहा था उसे ,बेहद मुश्किल है,
जला कर रखना चिराग यादोँ के।
यह और भी बहुत मुश्किल है,
भुल जाओ वफ़ा किसी की फरियादोँ मेँ।
पर सोचा उसने जला कर ही रखुँगा मैँ ,
चिराग उसके वफा की यादोँ की।
पर एक तेज झोँका बुझा गया ,
मेरी उल्फत की यादोँ को ।।
उस दीपक की लो तो बुझ गई,
पर चिन्गारी बाकी है ।
वादा तो किया था लौटने का उसने
क्योँकि सारी जिन्दगी तो उसकी बाकी है।
यादोँ की चिन्गारी के सहारे
जिन्दगी गुजार लेगा वह अपनी ।
कोई सहारा उसका ना रहा ,
मिट गये सारे सहारे उसके ।।
क्योँकि ,वफा की ...यादोँ के ...
फरियादोँ के ......
दीपक ......बुझ गये ।

Tuesday, January 5, 2010

हकिकत

कितना हसीन ख्वाब था ,
कितनी बहकी शमाँ थी ।
एक पल के लिए ये जहाँ ,ये जमीँ
सब थमीँ हुई थी ।
इस शमाँ मेँ मैँ और आप थे ,
एक दुसरे के करीब हम दोनो के करीब
हमदोनोँ मुस्कुरा रहे थे ।
हँसते हुए आपने कुछ कहा मुझसे
सुनना चाहा था मैँने पर
सुन सका न मैँ क्योँकि
मेरी आँख खुल चुकी थी ।
पल भर का ख्वाब हकिकत मेँ आया

सामने मेरे विरान जंगल और वहाँ अकेला मैँ ,
मेरी नीँद टुट चुकी थी ।

सुजीत कुमार "जलज"