Tuesday, May 18, 2010

यादेँ

नवोदय की मस्तानी ,बेफिक्र कि जिन्दगी और अपनी मनमानी से लबरेज महफिल को
यूँहि रुसवा कर खुद को तन्हा बनाने के बाद मैँने ये कभी नही सोचा था कि
एक दिन खुद जिन्दगी मुझे अपने आगोश मेँ ले लेगी ,मेरे सारे शिकवे दुर हो
जाएँगे ।
और मैँ सच मेँ अपनी खुबसुरत जिन्दगी का लुत्फ उठा पाऊँगा ।
ये सब कुछ मेरे लिए एक दु:स्वप्न ही तो था ।पर करिश्मा-ए-रहिम का देखेँ ,
उन्होनेँ मुझे पटना के साईँस काँलेज मेँ भेज कर मेरे सारे गमोँ को
उन्होनेँ छिन लिया ।
और मैँ वाकई मेँ आज हँस रहा हुँ ।
शुक्रगुजार हुँ मैँ अपने इस काँलेज के मेरे तमाम दोस्तोँ (IDIOTS) का
,यहाँ के खुशनुमा माहौल का और अपने उस उपर वाले का जिन्होँने मेरी
वास्तविक पहचान लौटा दी ।

पर आज जब मैँ एक बार फिर नवोदय के ही जैसे इसे भी छोड़ने का फैसला ले रहा
हुँ तो बरबस मेरा ध्यान सुरज ,जाँन ,नदीम ,रवि ,हीना ,ज्योति ,
ये सब लोग खिँच लेते हैँ । और बारी-2 से पुछ रहेँ हैँ क्या तुम मुझे छोड़
कर जा रहे हो ?
मैँ बस रोता हुआ सब के सामने से हट जाता हुँ ।
और मैँ कर भी क्या सकता हुँ । मेरे पास उनके सवालोँ का कोई जबाब नहीँ है ।
बस आप मुझे अपनी यादोँ मे जिन्दा रखना
और मैँ
सबोँ के यादो के दीपक जला कर रखुँगा ।
मेरे अजीज हो सके तो मुझे माफ करना ।
--
....jalaj@sujeet........

Sunday, March 7, 2010

खिज़ाँ की बहार

खिज़ाँ पर लौटी थी बहार
चंद दिनोँ के लिए ही ।
पर सुखी डाल पर कैसे
सुनहले सुन्दर फुल अच्छे लगते ,
सो लौट गई सावन बादलोँ के पास ।
इस डाल को तोड़ कर
बदरंग कर
लहराती ,मंडराती
अपनी उस खुशी के पास ............


सुजीत कुमार "जलज"

--
....jalaj@sujeet........

Friday, February 12, 2010

घर का परिँदा

उस वक्त मैँ नवोदय विद्यालय के दसवीँ कक्षा का छात्र था ।अप्रेल के महिने
मेँ पढाई का कुछ ज्यादा टेँशन नही था और ना ही प्रशासन से उतना डर ।पुरी
तरह से आश्वस्त हो कर हमलोग रविवार को अपने-अपने घर भाग जाया करते थे ।
उस दिन मैँ भी घर आया था ,पर काफी दिनोँ बाद ।लगभग तीन चार महीनोँ के बाद
।घर मेँ कदम रखते के साथ ही मुझे टेँऽऽ..ऽटेँ.ऽऽटेँ.एंऽऽ और साथ मेँ दीदी
की मिली-जुली आवाज मीठुऽऽ..मीठु ऽआऽऽआ...ऽ कटोरेऽऽ सुनाई दी ।मैँ आवाज
सुनकर समझ गया की दीदी अपनी ख्वाहिश पुरी कर चुकी है ।उसकी इच्छा थी कि
घर मेँ एक तोता रहे जो अपने मधुर आवाज से हर किसी को रिझाता रहे ।
हालांकि मुझे भी काफी खुशी हुई ।पर मैँ चेहरे पर किसी तरह का भाव न लाया
...ऐसा मेरी आदत मेँ ही शामिल है ।मैँ जब खुश होता हुँ या फिर मैँ दु:ख
मेँ होता हुँ तो भी मेरा चेहरा NORMAL ही रहता है ।
मैँने तोते को बहुत करीब से देखा ,'एक मासुम निरीह सा प्राणी ,छोटा सा
किन्तु बहुत प्यारा ,अपने छोटे छोटे टांगो को मजबुती के साथ आगे बढाता
हुआ मेरे करीब से निकल गया ।उसमेँ कोई शिकन न थी और न किसी से डर ।हमारे
परिवार मेँ वह इस कदर शामिल था जैसे वह हमारे ही परिवार का एक सदस्य हो ।
मैँने उसे पकड़ने को हाथ बढाया तोऽऽतोऽउसका RESPONSE सबको हंसा देने को
काफी ता । पैरोँ को आगे न बढाकर वो पहले दायेँ पैर को दायीँ ओर बढाकर फिर
बायेँ पैर को भी उसी तरफ बढाकर हमसे कट सा गया ।पर थोड़ी दुर जाकर वह मुझे
आंखे तरेर कर देख रहा था और साथ मेँ उसकी टेँऽऽटेँऽ की आवाज ,पर थोड़ी
गुर्राहट के साथ ।मैँ भी उसकी इस अदा पर मुस्कुरा दिया ।

Thursday, January 28, 2010

दीपक...... बुझ गए ।।

किसी ने कहा था उसे ,बेहद मुश्किल है,
जला कर रखना चिराग यादोँ के।
यह और भी बहुत मुश्किल है,
भुल जाओ वफ़ा किसी की फरियादोँ मेँ।
पर सोचा उसने जला कर ही रखुँगा मैँ ,
चिराग उसके वफा की यादोँ की।
पर एक तेज झोँका बुझा गया ,
मेरी उल्फत की यादोँ को ।।
उस दीपक की लो तो बुझ गई,
पर चिन्गारी बाकी है ।
वादा तो किया था लौटने का उसने
क्योँकि सारी जिन्दगी तो उसकी बाकी है।
यादोँ की चिन्गारी के सहारे
जिन्दगी गुजार लेगा वह अपनी ।
कोई सहारा उसका ना रहा ,
मिट गये सारे सहारे उसके ।।
क्योँकि ,वफा की ...यादोँ के ...
फरियादोँ के ......
दीपक ......बुझ गये ।

Tuesday, January 5, 2010

हकिकत

कितना हसीन ख्वाब था ,
कितनी बहकी शमाँ थी ।
एक पल के लिए ये जहाँ ,ये जमीँ
सब थमीँ हुई थी ।
इस शमाँ मेँ मैँ और आप थे ,
एक दुसरे के करीब हम दोनो के करीब
हमदोनोँ मुस्कुरा रहे थे ।
हँसते हुए आपने कुछ कहा मुझसे
सुनना चाहा था मैँने पर
सुन सका न मैँ क्योँकि
मेरी आँख खुल चुकी थी ।
पल भर का ख्वाब हकिकत मेँ आया

सामने मेरे विरान जंगल और वहाँ अकेला मैँ ,
मेरी नीँद टुट चुकी थी ।

सुजीत कुमार "जलज"