Tuesday, October 8, 2013

एक मुस्कान

एक मुस्कान, मंदिर की सीढ़ी है,
एक मुस्कान, शांति का स्वर है।
एक मुस्कान समझौते का प्रतिवेदन है,
एक मुस्कान, प्रेम की व्याकुलता का अव्याकुल क्षण है।
और एक मुस्कान, तुम्हारे मनुष्य होने का परिचायक है॥
मुस्कुराओ…………… मुस्काओ……… एक बार फिर॥
तुम्हारे बारीक और नन्हें होठ मुस्कान के प्रतिहारी हैं।
तुम्हारा चेहरा मुस्कान का भागीदार बनना चाह्ता है।
एक मुस्कान, अनंत सुख, अनंत समृद्धि ,वैभव-विलास
शांत-प्रशांत, शीतल ठहरे हुए महासागर का अथाह नील आवरण ।
एक मुस्कान, मलमल है ढाके की,
एक मुस्कान, फिसलता हुआ समतल है मखमली शैय्या की।
वही एक मुस्कान ,क्रोध का प्रतिरोधी है,
प्यार का समवर्ती है॥
सो हमेशा मुस्कुराते रहना। तुम्हारे मुस्कुराने से मेरे दिन होते है,
तुम्हारे उदास होने से शाम॥


--jalaj@sujeet--

Sunday, August 18, 2013

मात्र दो सेकण्ड का अनुभव

                    मात्र दो सेकण्ड का अनुभव
Date -29/12/2006                                                                     Day- Friday

10वीं एवं 12वीं की meeting दोपहर लगभग एक बजकर पच्चीस मिनट पर समाप्त हुई थी। hostel में लौटने के बाद मैं बाथरुम चला गया । मजाकवश ही सही मेरे एक दोस्त ने बाथरुम का दरवाजा बाहर से lock कर दिया ।काफी देर तक मैं भीतर निकलने का तरीका ढ़ुंढ़ता रहा। आवाज देने का कोई फायदा भी नही , क्योंकि लगभग सभी लोग खाना  खाने मेस जा चुके थे।
बाहर निकलने का जब कोई रास्ता न दिखा तो मैने रोशनदान से निकलने का फैसला किया । और रोशनदान पर चढ़कर बाहरी तरफ निकलकर पाइप को पकड़कर खड़ा हो गया । नीचे से लगभग 20 फीट की ऊँचाई और मैं दीवार के बीचो-बीच पाइप से चिपका हुआ था। हिम्मत बढ़ाई उस उपरवाले ने और मैं धीरे-धीरे नीचे उतरने का प्रयास करने लगा । तभी मुझे ऐसा लगा कि यह पाइप दीवार से उखड़ने वाला है । मेरे पास वक़्त कम था । मैने आव देखा न ताव , अपने कंधे को बांयी तरफ कस कर झटका देकर पंजो एवं घुटनों के बल नीचे कुद गया। गलतीवश मेरा दाहिना पैर उस पाइप से टकरा गया और वह भी दीवार से उखड़कर नीचे गिर गया । मुझे इस बात का एह्सास हो गया था कि पाइप वहाँ से हट गया है । अतः नीचे गिरने के साथ ही मैनें झटके से उपर देखा। देखा…… वह पाइप बिल्कुल ही मेरे उपर गिर रहा था । तुरंत ही मै अपने पंजों को बल देकर दुसरी तरफ कुद गया। गलती से इस बार मैं एक ईंट के उपर जा गिरा ,जिससे की मेरे कमर एवं दाहिने पैर में एक हलकी सी चोट आयी। पर खुदा का शुक्र मानता हुँ कि 20 फीट की ऊँचाई से कुदने के बाद मुझे कहीं एक खरोंच तक नही आई। साथ में उस लोहे की भारी पाइप से बचने के क्रम में आई चोट को तुच्छ ही मानता हुँ ।
और इसी तरह से मेरे adventures वाली list में एक और पेज जुड़ गया था। फिर छत पर से कुदने कि ये मेरी एक और कहानी लोगों के बीच थी।

                                                         -- jalaj@sujeet--

Tuesday, July 2, 2013

बेबस मजदुर माँ

अपनी इस नयी खिड़की से जब भी बाहर देखता हुँ, तो बहुत कुछ दिखता है मुझे । पर नज़रें टिकी रह जाती है उन लोगों के उपर जिनपर शायद ही किसी की निगाह जाती होगी ।

हर बार अपने सपनों के बदले 
गिनती के दस ईंटों को
सिर पर ढ़ोते हुए
मैनें देखा है ।
उस औरत को,
जिसकी छाती से चिपका है
एक मरणासन्न शिशु
और दुसरा…………
फुले हुए पेट ,कमजोर टांगो से
चलता हुआ, अपनी माँ के साथ ।
लोरें बहाते ,बिना कुछ बोले
कहता ,”
मैया, हमरा के कुछो खायऽऽ लऽ देब

--jalaj@sujeet--

Saturday, May 18, 2013

एक चकोर जो हुँ।

पूर्ण अमावस की रात से ही मैंने देखा है, उस चाँद को। हर रात बादलों से
लड़ते देखा है मैनें उस चाँद को। कोशिश की है मैने उसे ढुँढने की उस घनेरी
रात में जिसमे अपने साये का भी भरोसा नही होता।
पुरी दुनिया अँधेरे से दुर भाग, अपने घरोंदो में छुपे बैठे थे जब………… मैं
तब भी निकलता था आसमां में रोशनी की लकीरें ढुंढने।
कुछ टिमटिमाहट और घुप अँधेरा…………… पर आंखे तक रही है…… उपर अनंत आसमां की
ओर….. एक विश्वास है ये मेरा। एक चकोर जो हुँ।
मैने देखा है उसे हर पल बढ़ते हुए। एक जुगनू की रोशनी के मानिंद से…
कतरा-कतरा। और आज वो चांद पुरे फ़लक पर है । उसकी दुधिया रोशनी जग को नहला
रही है। अछुता हुँ तो बस मैं । एक चकोर जो हुँ।
मेरी आदत है बेसब्री से इन्तज़ार करना पूर्णिमा के चांद का। पर सह नही
सकता उसकी अथाह रोशनी । आँखे मेरी चकाचौंध हो गई………और मैं छुप गया। दुआ
है रहीम से मेरी, बरकरार रखे उनकी रोशनी। ताकि हर रात चुपके से ही सही ,
उनके खिलखिलाते अक़्स का दिदार हो मुझे………… आखिर एक चकोर जो हुँ।
--jalaj@sujeet--

Sunday, May 5, 2013

इन्सां जो हुँ।

लहरों की तरह बार-बार आस जगती है………उसके पास आने की। पर साहिल पर रखे
पत्थर कि तरह दिल पर एक चोट कर वापस लौट जाती है। कोशिश करता हुँ खुद को
संभालने की, उस चोट के बाद । पर मौका मिलता नहीं। एक के बाद एक, और कई
चोट खाने के बाद ताकत ही नही रहती संभलने की……………………आखिर इन्सां जो हुँ।
पर वो "निशान" इस बात की याद दिलाता रहता है…………मुन्तज़िर हो तुम, परवाह
नही तुझे खुद की। और उस अज्ञात प्रतिध्वनि के अदृश्य आदेश पर …ये आँखे
तकने लगती है फिर से………शुन्य में । आखिर इन्सां जो हुँ।
कहा था एक बार उसने मुझसे,"मुझे वापस आना है"। पर याद नही मुझे, शायद
उसने ये ख्वाब में बोला था।पर जारी है, मेरा वो कभी खत्म ना होने वाला
इन्तज़ार। हर ख्वाब को हक़िकत जो बनाना था मुझे। ऐसा मैं करता भी क्यों
नही? आखिर इन्सां जो हुँ॥

--jalaj@sujeet--

Wednesday, April 24, 2013

एक लम्बा इन्तज़ार

-- 30-40 गज से ज्यादा की दुरी नही होगी वो। हाँ ,दो लकिरें उसे आगे जाने
से रोकती है। एक खुबसुरत सा हरा भरा मैदान एक हाथ और दुसरी तरफ एक
खुबसुरत चिकित्सा विभाग। इन्हीं के बीच हर शाम …… मंद मंद कदमों से ना
जाने किन ख्यालों में गुम चलता है। उस लकीर से इस लकीर तक पहुँचने के बाद
उसकी आँखे कुछ बेचैन सी दिखती है। शायद किसी का इन्तज़ार हो उसे। पर यह
सोच कर ही मुझे झुरझुरी सी आ जाती है……… इन्तज़ार अगर इतना लंबा हो, तो
शायद मैं सही हुँ हर किसी को अपनी ज़िन्दगी से निकाल कर।
एक बार मैनें उसे दौड़ते देखा था। जल्दबाजी भरी थी उसके भीतर और इतना
बेताब वो पहली बार था। एक झलक उस चांद की मैनें भी देखी थी, जिसके लिये
वो दौड़ रहा था। वो चाँद उस तरह से दुबारा उस गली में कभी नही निकला। पर
उस आशिक़ का इन्तज़ार आज भी बरकरार है। उसे उम्मीद है कि यह चाँद अगली बार
उसकी गली में रौशन जरुर होगा॥

Thursday, February 7, 2013

और मैं बुद्धु बन गया

2013 के पहले महीने के आखिरी दिन की शाम। आदत के मुताबिक अपने आप से
बातें कर रहा था। कुछ अनसुलझे से सवाल थे, मुझे परेशान किए हुए। यकिन नही
था मुझे उस पर जो मेरे साथ होने वाला थ। विश्वास के साथ कह सकता हुँ
,परसों कोई अमावस की रात बिल्कुल नही थी । अक्सर रात को मैं चांद से
मिलता जो हुँ ।
पर ऐसा क्यों कि ''दुज का चांद'' आज मेरे सामने अठ्खेलियाँ कर रहा हो। और
मै भ्रमित, अक्सर जिसके दिदार को मैं तरसता रहा था, अचानक वो मेरी नज़रों
को मेरी ही तन्हाई में गुलज़ार कर रहा हो।
वस्तुतः उसे मुझसे लुकाछिपी खेलनी थी। एक खेल जिसमें दिल एक नादान सा
परिंदा बन जाता है। और पुरे गगन को अपना समझ आगोश में भर लेने को दौड़
पड़ता है। एक पल को मैं खुद को ही भुल गया, और उस चांद से लुकाछिपी खेलने
लगा। जब वो आंखों से ओझल होता तो मैं उसे छुप छुप कर ढ़ुंढ़ता।
मैने एक बात अनुभव किया, उसका मेरी आंखों से ओझल हो जाना ,मुझे बहुत ही
ज्यादा बेचैन कर देता। पागलों की तरह मैं उसे ढ़ुंढ़ने लगता। और घोर
आश्चर्य तो तब होता जब वो मिल जाने पर मेरी बेताबी पर मुस्कुरा देता, और
मैं झिझक, शर्म, और डर की वजह से उससे नज़रें भी नही मिला पा रहा होता।
इस खेल में कोशिश दोनों तरफ़ से जारी थी, की बस वो मुझे नही देखे, और मैं
उसका भरपुर जायजा लुँ। सो मुझे खुशी भी मिल रही थी ,इस लुकाछिपी के खेल
में।
एक कड़वा सच इस दुनिया का…………''खुशियाँ दो पल की ही मेहमान होती हैं
।''उसके बाद की ज़िंदगी या तो सपाट रेगिस्तान की तरह या फिर उसी रेगिस्तान
मे बर्फ़िली तुफ़ान की तरह।
''दुज का चांद'' दो पल को ही आया था अपने आशिक़ की आंखों के सामने। वो
मुझसे छिपने लगा। मैं दुसरे रास्ते से दौड़ कर उसका दिदार किया। वो
मुस्कुराया और गहरे अँधेरे की ओर डुबने लगा। मै और तेज दौड़ा, बेतहाशा, एक
नए रास्ते से ताकि उसे उसके सामने से एक बार और जी भर कर देखुं। उस मोड़
पर खड़ा , जहां से उसे मैं अपनी ही आंखों से दूर जाते देख सकता था। बहुत
ही मुश्किल कार्य था यह मेरे लिए। पर इस दिल को कौन समझाये। काफी देर तक
मैं उसका इन्तज़ार करता रहा। पर वो दुबारा नज़र नही आया। बहुत ही निराश,
फिर सोचा , शायद ये मेरा वहम रहा हो। भला वो आज मेरे सामने कैसे आ सकता
है। मेरे कदमों मे भी उदासी आ गयी थी। और मैं फिर अपने रास्ते पलट गया।
थोड़ा नफ़सियाती सा होने लगा था मैं, पर आंखें फटी की फटी रह गयी। अपनी
आंखों पर मुझे विश्वास ही नही हो रहा था।मेरे सामने खड़े होकर मेरे इस
हालत पर हंसे जा रहा था। और मैं बेबस , बुत सा खड़ा बस एक टक उसके
मुस्कुराते चेहरे को देखे जा रहा था। वो मुझे बुद्धु बना चुका था।
असमंजस में था मैं , फिर मेरे कदम अपने आप पिछे हटने लगे। मुझे उसके पास
प्रणय निवेदन करना था, उसे अपने आगोश मे लेना था। पर यह क्या? मेरी
हिम्मत ही जवाब देने लगी। और मैं कमजोर हो गया। मेरे कदम अपने आशियाने की
तरफ बढ़ने लगे, और वो गहरे अंधेरे की ओर। मैं किंकर्तव्यविमुढ़ तो था ही,
बेबस भी हो गया था। और बस उसे डुबते हुए देखता रहा एक टक।

--jalaj@sujeet--