यादेँ
यूँहि रुसवा कर खुद को तन्हा बनाने के बाद मैँने ये कभी नही सोचा था कि
एक दिन खुद जिन्दगी मुझे अपने आगोश मेँ ले लेगी ,मेरे सारे शिकवे दुर हो
जाएँगे ।
और मैँ सच मेँ अपनी खुबसुरत जिन्दगी का लुत्फ उठा पाऊँगा ।
ये सब कुछ मेरे लिए एक दु:स्वप्न ही तो था ।पर करिश्मा-ए-रहिम का देखेँ ,
उन्होनेँ मुझे पटना के साईँस काँलेज मेँ भेज कर मेरे सारे गमोँ को
उन्होनेँ छिन लिया ।
और मैँ वाकई मेँ आज हँस रहा हुँ ।
शुक्रगुजार हुँ मैँ अपने इस काँलेज के मेरे तमाम दोस्तोँ (IDIOTS) का
,यहाँ के खुशनुमा माहौल का और अपने उस उपर वाले का जिन्होँने मेरी
वास्तविक पहचान लौटा दी ।
पर आज जब मैँ एक बार फिर नवोदय के ही जैसे इसे भी छोड़ने का फैसला ले रहा
हुँ तो बरबस मेरा ध्यान सुरज ,जाँन ,नदीम ,रवि ,हीना ,ज्योति ,
ये सब लोग खिँच लेते हैँ । और बारी-2 से पुछ रहेँ हैँ क्या तुम मुझे छोड़
कर जा रहे हो ?
मैँ बस रोता हुआ सब के सामने से हट जाता हुँ ।
और मैँ कर भी क्या सकता हुँ । मेरे पास उनके सवालोँ का कोई जबाब नहीँ है ।
बस आप मुझे अपनी यादोँ मे जिन्दा रखना
और मैँ
सबोँ के यादो के दीपक जला कर रखुँगा ।
मेरे अजीज हो सके तो मुझे माफ करना ।
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....jalaj@sujeet........




