Tuesday, July 5, 2011

यादें

यादेँ

नवोदय की मस्तानी ,बेफिक्र कि जिन्दगी और अपनी मनमानी से लबरेज महफिल को
यूँहि रुसवा कर खुद को तन्हा बनाने के बाद मैँने ये कभी नही सोचा था कि
एक दिन खुद जिन्दगी मुझे अपने आगोश मेँ ले लेगी ,मेरे सारे शिकवे दुर हो
जाएँगे ।
और मैँ सच मेँ अपनी खुबसुरत जिन्दगी का लुत्फ उठा पाऊँगा ।
ये सब कुछ मेरे लिए एक दु:स्वप्न ही तो था ।पर करिश्मा-ए-रहिम का देखेँ ,
उन्होनेँ मुझे पटना के साईँस काँलेज मेँ भेज कर मेरे सारे गमोँ को
उन्होनेँ छिन लिया ।
और मैँ वाकई मेँ आज हँस रहा हुँ ।
शुक्रगुजार हुँ मैँ अपने इस काँलेज के मेरे तमाम दोस्तोँ (IDIOTS) का
,यहाँ के खुशनुमा माहौल का और अपने उस उपर वाले का जिन्होँने मेरी
वास्तविक पहचान लौटा दी ।

पर आज जब मैँ एक बार फिर नवोदय के ही जैसे इसे भी छोड़ने का फैसला ले रहा
हुँ तो बरबस मेरा ध्यान सुरज ,जाँन ,नदीम ,रवि ,हीना ,ज्योति ,
ये सब लोग खिँच लेते हैँ । और बारी-2 से पुछ रहेँ हैँ क्या तुम मुझे छोड़
कर जा रहे हो ?
मैँ बस रोता हुआ सब के सामने से हट जाता हुँ ।
और मैँ कर भी क्या सकता हुँ । मेरे पास उनके सवालोँ का कोई जबाब नहीँ है ।
बस आप मुझे अपनी यादोँ मे जिन्दा रखना
और मैँ
सबोँ के यादो के दीपक जला कर रखुँगा ।
मेरे अजीज हो सके तो मुझे माफ करना ।


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....jalaj@sujeet........

अकेली पंछी

""अकेली पंछी""

  ""अकेली पंछी""  
वो अकेली उडती पंछी
गगन में कुलांचे भरती हुई,
कहती, ये पूरा गगन हमारा है|
ऊपर निचे दायें बाएं
सैर करती और कहती
ये पूरा आसमान हमारा है |
ना परवाह मुझे किसी की
ना मां की ना मेरे बाप की
ठोकर दोस्तों को मार, हंस कर
कहती ,ये जिंदगी हमारी है|
वो अकेली उडती पंछी .....
अकेले अकेले ही दिन भर उडती रही
और सबको सुनाती रही बड़े ही गर्व से
ये पूरी धरती ही हमारी है
बहुत खुश थी वो आज
पूरी दुनिया को यह बता कर
जिससे खुद
वो पूरी तरह अनज़ान थी
की वो आज अकेली है..|
शाम होते ही वो पंछी,
लौटी अपने आश्रय में
देखते ही अपने छोटे से घर को
चिल्ला कर जोश में बोली
आज ये इतनी बड़ी बिस्तर भी हमारी है||
थकी मांदी दिन भर की बेचारी
आँखें लग गयी मिनट भर में
पर जुबां से ये लफ्ज़ निकलते रहे,
ये नींद भी हमारी है
ये सपने भी हमारे है||
एक करवट बदलते ही उसे 
याद आ गयी पिछली रात की
उसका पति अपनी बाहों में ले
बड़े प्यार से बोला था
जानू पूरी जिंदगी मै अपनी
तुम्हारे नाम करना चाहता हूँ
जीना चाहता हूँ मै तुम्हारे साथ
मरना चाहता हूँ मै तुम्हारे साथ इस बात पर न जाने क्यों,,
इस पंछी को आ गया था गुस्सा
कुछ जुमले बोल दिए थे उसने
 सुनकर जिसे उसका पति सह नहीं पाया;
और वो वहीँ करवट लिए सोता ही रह गया
और ये पंछी बेपरवाह हो उड़ने चली गयी|
पर आज करवट बदलने पर
पूरा बिस्तर ही सुना मिला|
कोई नहीं था वहाँ ,जो
इसे अपनी बाहों में लेकर प्यार देता |
और तब जाकर ये पंछी बोलती
हाँ ये हसीं रात भी हमारी है||
एहसास हुआ इसे अपने अकेलेपन का,
रात के घोर सन्नाटे का
मेढक के टर्राने का,
और झींगुरों के मुंह चिढाने का|
तब ये अकेली पंछी
आँखों में लोरें भरे हुए
सिसकते हुए बोली....
हाँ ये तन्हाई भी हमारी है
ये अश्क भी हमारा है|
पर एहसास है मुझे अपनी भूल का...
बस...बस... लौटा दो उसे कोई
वो प्यार भी हमारा है|
वो प्यारा भी हमारा है|||
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....jalaj@sujeet........



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....jalaj@sujeet........

ghazal

तेरी यादों मी डूब कर मुझे ये जमाना भुलाना अच्छा लगता है
दबी है चिंगारिया दिल में मेरे पर मुस्कुराना अच्छा लगता है |
मेरे इस गुनाह का किसी से कोई शिकवा नहीं है पर
कभी कभी तो मुझे आपका मुजरिम बनना भी अच्छा लगता है||
ये क्या हुआ आपको ,मेरे शीशे का महल पसंद नहीं आया
खैर अब तो मुझे रेत पर रेत का महल बनाना भी अच्छा लगता है|||
दिल के जेहन में रखा है छुपा कर नाम तेरा
इन लहरों को तो साहिल पर लिखा नाम मिटाना भी अच्छा लगता है||||
अश्क -ऐ-महफ़िल उदास "जलज" करे तो क्या करे तुम बिन
चुप चुप कर अश्क बहाना भी इन्हें बहुत अच्छा लगता है|||||


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....jalaj@sujeet........