2013 के पहले महीने के आखिरी दिन की शाम। आदत के मुताबिक अपने आप से
बातें कर रहा था। कुछ अनसुलझे से सवाल थे, मुझे परेशान किए हुए। यकिन नही
था मुझे उस पर जो मेरे साथ होने वाला थ। विश्वास के साथ कह सकता हुँ
,परसों कोई अमावस की रात बिल्कुल नही थी । अक्सर रात को मैं चांद से
मिलता जो हुँ ।
पर ऐसा क्यों कि ''दुज का चांद'' आज मेरे सामने अठ्खेलियाँ कर रहा हो। और
मै भ्रमित, अक्सर जिसके दिदार को मैं तरसता रहा था, अचानक वो मेरी नज़रों
को मेरी ही तन्हाई में गुलज़ार कर रहा हो।
वस्तुतः उसे मुझसे लुकाछिपी खेलनी थी। एक खेल जिसमें दिल एक नादान सा
परिंदा बन जाता है। और पुरे गगन को अपना समझ आगोश में भर लेने को दौड़
पड़ता है। एक पल को मैं खुद को ही भुल गया, और उस चांद से लुकाछिपी खेलने
लगा। जब वो आंखों से ओझल होता तो मैं उसे छुप छुप कर ढ़ुंढ़ता।
मैने एक बात अनुभव किया, उसका मेरी आंखों से ओझल हो जाना ,मुझे बहुत ही
ज्यादा बेचैन कर देता। पागलों की तरह मैं उसे ढ़ुंढ़ने लगता। और घोर
आश्चर्य तो तब होता जब वो मिल जाने पर मेरी बेताबी पर मुस्कुरा देता, और
मैं झिझक, शर्म, और डर की वजह से उससे नज़रें भी नही मिला पा रहा होता।
इस खेल में कोशिश दोनों तरफ़ से जारी थी, की बस वो मुझे नही देखे, और मैं
उसका भरपुर जायजा लुँ। सो मुझे खुशी भी मिल रही थी ,इस लुकाछिपी के खेल
में।
एक कड़वा सच इस दुनिया का…………''खुशियाँ दो पल की ही मेहमान होती हैं
।''उसके बाद की ज़िंदगी या तो सपाट रेगिस्तान की तरह या फिर उसी रेगिस्तान
मे बर्फ़िली तुफ़ान की तरह।
''दुज का चांद'' दो पल को ही आया था अपने आशिक़ की आंखों के सामने। वो
मुझसे छिपने लगा। मैं दुसरे रास्ते से दौड़ कर उसका दिदार किया। वो
मुस्कुराया और गहरे अँधेरे की ओर डुबने लगा। मै और तेज दौड़ा, बेतहाशा, एक
नए रास्ते से ताकि उसे उसके सामने से एक बार और जी भर कर देखुं। उस मोड़
पर खड़ा , जहां से उसे मैं अपनी ही आंखों से दूर जाते देख सकता था। बहुत
ही मुश्किल कार्य था यह मेरे लिए। पर इस दिल को कौन समझाये। काफी देर तक
मैं उसका इन्तज़ार करता रहा। पर वो दुबारा नज़र नही आया। बहुत ही निराश,
फिर सोचा , शायद ये मेरा वहम रहा हो। भला वो आज मेरे सामने कैसे आ सकता
है। मेरे कदमों मे भी उदासी आ गयी थी। और मैं फिर अपने रास्ते पलट गया।
थोड़ा नफ़सियाती सा होने लगा था मैं, पर आंखें फटी की फटी रह गयी। अपनी
आंखों पर मुझे विश्वास ही नही हो रहा था।मेरे सामने खड़े होकर मेरे इस
हालत पर हंसे जा रहा था। और मैं बेबस , बुत सा खड़ा बस एक टक उसके
मुस्कुराते चेहरे को देखे जा रहा था। वो मुझे बुद्धु बना चुका था।
असमंजस में था मैं , फिर मेरे कदम अपने आप पिछे हटने लगे। मुझे उसके पास
प्रणय निवेदन करना था, उसे अपने आगोश मे लेना था। पर यह क्या? मेरी
हिम्मत ही जवाब देने लगी। और मैं कमजोर हो गया। मेरे कदम अपने आशियाने की
तरफ बढ़ने लगे, और वो गहरे अंधेरे की ओर। मैं किंकर्तव्यविमुढ़ तो था ही,
बेबस भी हो गया था। और बस उसे डुबते हुए देखता रहा एक टक।
--jalaj@sujeet--
बातें कर रहा था। कुछ अनसुलझे से सवाल थे, मुझे परेशान किए हुए। यकिन नही
था मुझे उस पर जो मेरे साथ होने वाला थ। विश्वास के साथ कह सकता हुँ
,परसों कोई अमावस की रात बिल्कुल नही थी । अक्सर रात को मैं चांद से
मिलता जो हुँ ।
पर ऐसा क्यों कि ''दुज का चांद'' आज मेरे सामने अठ्खेलियाँ कर रहा हो। और
मै भ्रमित, अक्सर जिसके दिदार को मैं तरसता रहा था, अचानक वो मेरी नज़रों
को मेरी ही तन्हाई में गुलज़ार कर रहा हो।
वस्तुतः उसे मुझसे लुकाछिपी खेलनी थी। एक खेल जिसमें दिल एक नादान सा
परिंदा बन जाता है। और पुरे गगन को अपना समझ आगोश में भर लेने को दौड़
पड़ता है। एक पल को मैं खुद को ही भुल गया, और उस चांद से लुकाछिपी खेलने
लगा। जब वो आंखों से ओझल होता तो मैं उसे छुप छुप कर ढ़ुंढ़ता।
मैने एक बात अनुभव किया, उसका मेरी आंखों से ओझल हो जाना ,मुझे बहुत ही
ज्यादा बेचैन कर देता। पागलों की तरह मैं उसे ढ़ुंढ़ने लगता। और घोर
आश्चर्य तो तब होता जब वो मिल जाने पर मेरी बेताबी पर मुस्कुरा देता, और
मैं झिझक, शर्म, और डर की वजह से उससे नज़रें भी नही मिला पा रहा होता।
इस खेल में कोशिश दोनों तरफ़ से जारी थी, की बस वो मुझे नही देखे, और मैं
उसका भरपुर जायजा लुँ। सो मुझे खुशी भी मिल रही थी ,इस लुकाछिपी के खेल
में।
एक कड़वा सच इस दुनिया का…………''खुशियाँ दो पल की ही मेहमान होती हैं
।''उसके बाद की ज़िंदगी या तो सपाट रेगिस्तान की तरह या फिर उसी रेगिस्तान
मे बर्फ़िली तुफ़ान की तरह।
''दुज का चांद'' दो पल को ही आया था अपने आशिक़ की आंखों के सामने। वो
मुझसे छिपने लगा। मैं दुसरे रास्ते से दौड़ कर उसका दिदार किया। वो
मुस्कुराया और गहरे अँधेरे की ओर डुबने लगा। मै और तेज दौड़ा, बेतहाशा, एक
नए रास्ते से ताकि उसे उसके सामने से एक बार और जी भर कर देखुं। उस मोड़
पर खड़ा , जहां से उसे मैं अपनी ही आंखों से दूर जाते देख सकता था। बहुत
ही मुश्किल कार्य था यह मेरे लिए। पर इस दिल को कौन समझाये। काफी देर तक
मैं उसका इन्तज़ार करता रहा। पर वो दुबारा नज़र नही आया। बहुत ही निराश,
फिर सोचा , शायद ये मेरा वहम रहा हो। भला वो आज मेरे सामने कैसे आ सकता
है। मेरे कदमों मे भी उदासी आ गयी थी। और मैं फिर अपने रास्ते पलट गया।
थोड़ा नफ़सियाती सा होने लगा था मैं, पर आंखें फटी की फटी रह गयी। अपनी
आंखों पर मुझे विश्वास ही नही हो रहा था।मेरे सामने खड़े होकर मेरे इस
हालत पर हंसे जा रहा था। और मैं बेबस , बुत सा खड़ा बस एक टक उसके
मुस्कुराते चेहरे को देखे जा रहा था। वो मुझे बुद्धु बना चुका था।
असमंजस में था मैं , फिर मेरे कदम अपने आप पिछे हटने लगे। मुझे उसके पास
प्रणय निवेदन करना था, उसे अपने आगोश मे लेना था। पर यह क्या? मेरी
हिम्मत ही जवाब देने लगी। और मैं कमजोर हो गया। मेरे कदम अपने आशियाने की
तरफ बढ़ने लगे, और वो गहरे अंधेरे की ओर। मैं किंकर्तव्यविमुढ़ तो था ही,
बेबस भी हो गया था। और बस उसे डुबते हुए देखता रहा एक टक।
--jalaj@sujeet--