आँखो पर लटके
गेसुओं से
इतना परेशान
क्युँ होती हो?
अपनी हाथों से
उठा कर
उसे कानों के
पिछे रखना।
एक नायाब सी अदा
है तुम्हारी ……….......सच॥
कभी कभी मैं
देखता हुं
और उसी में खो
जाता हुं।
शायद इसी से डर
कर
बेरहमी से
उन्हें कैद कर देती हो,
एक छोटे से गुच्छे
में॥
मेरा कहना मानो
तो
उन्हें बिखरे
हुए ही रहने दो
आजाद परिन्दों
के मानिन्द
खुले ही रहने
दो…॥
शायद मुझ जैसे भँवरों का
आशियाना यही है
………….......सच॥
तुम्हें देखता
हूँ
क्योंकि अच्छी
लगती है ,मुझे
तुम्हारी अदाएँ
तुम्हारी
मुस्कान
तुम्हारा हँस कर
अपनी सहेलियों से बतियाना
दबी जुबान से
मेरी बातें निकालना॥
और इन सब से
ज्यादा
अच्छा लगता है
मुझे
तुम्हारा मासुम
सा चेहरा;
और तुम॥
एक रात पुछा था
मुझसे
मेरे उपर वाले
ने
मैंने नींद मे
ही तुम्हे सबसे खुबसुरत बताया था।
तभी से हर चीज
मुझे
फिकी फिकी सी
लगती है………सच।
--jalaj@sujeet--