Monday, September 29, 2014

वो गंदी राजनीति


                                 


उसी अनजान कोठरी में आज फिर से मेरी आँख खुली।  अचंभित व डर का मिश्रित भाव चेहरे पर , पर आँखें अंधेरे को अभ्यस्त हो अपनी ही परछाई को ढूंढ रही थी। 
मैं अंधेरे व कीचड़ में तो था पर उस साफ़-सुथरी दुनिया में भावनाओं की ऊपर  से लिपा-पोती को साफ-साफ देख सकता था। 
मैं देख रहा था आदमियों को ,जिनके एक ही चेहरे पर कई मुखौटे बार-बार बदल रहे रहे थे।  एक साथ इतने रावण ???????  थोड़ी घबराहट हुई पर अचानक रात की कहानी मेरे दृष्टि-पटल पर घुम गई। मेरे पहचान वाले का वो एक दूसरा अजनबी सा अपरिचित चेहरा , मुझे सहमा दिया था और भाग कर मैं इसी कोठरी में अपनी सारी भावनाओं को छुपा दिया था।  एवज में  आँखें खामोश हो बस दो-चार आंसू बहा लिए; साथ ही मेरे यहां होने की वजह वजह भी समझ आ गयी  थी मुझे। 
सन्तुष्टता के भाव मेरी आँखों में आ गए थे। और मैं आराम से उसी दलदल में और तेजी से डूबने की कोशिश करने लगा।  रावणों की लंका में आराम की जिंदगी की उम्मीद करने से बेहतर है , अपने इस अंधेर कोठी में सुकून  से मर जाऊं। 
 मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई थी ,पर कोई और उसे देख पाता  इससे पहले ही वो कीचड़ मेरे सर के ऊपर तक पहुँच गया था। 

Sunday, March 9, 2014

वो गरीब आदमी……………॥

मैंने देखा है
पिल्लों को भी
गले लगकर मां के सोते हुए।
चिंटियों के झुंड को सिकुड़कर
छोटा होते हुए।
और पानी की बुंदों को
वर्फ के फाहों से बरसते हुए॥
उस सर्द मौसम में,
देखा है मैंने ।
कलियों को खिलने से
शरमाते हुए,
पर सुरज के पौ फटने के साथ
महक बिखेरते हुए।
पर विचार बदल जाते हैं,
मानव की मानवता देखकर॥
उसी सर्द रातों में जो
कई मोटे मोटे लबादों में।
चुल्हे सी गर्म घरों में भी
काँप रहे हैं॥
वहीं बीच सड़क पर
नीचे खुले आसमां के तले
चादर ओढ़े बड़े चैन से
सो रहा है -------

वो गरीब आदमी……………॥॥

Friday, February 14, 2014

सच, तुम बहुत अच्छी लगती हो !!

आँखो पर लटके
गेसुओं से
इतना परेशान क्युँ होती हो?
अपनी हाथों से उठा कर
उसे कानों के पिछे रखना।
एक नायाब सी अदा है तुम्हारी ……….......सच॥
कभी कभी मैं देखता हुं
और उसी में खो जाता हुं।
शायद इसी से डर कर
बेरहमी से उन्हें कैद कर देती हो,
एक छोटे से गुच्छे में॥
मेरा कहना मानो तो
उन्हें बिखरे हुए ही रहने दो
आजाद परिन्दों के मानिन्द
खुले ही रहने दो…॥
शायद मुझ जैसे भँवरों का
आशियाना यही है ………….......सच॥
तुम्हें देखता हूँ
क्योंकि अच्छी लगती है ,मुझे
तुम्हारी अदाएँ
तुम्हारी मुस्कान
तुम्हारा हँस कर अपनी सहेलियों से बतियाना
दबी जुबान से मेरी बातें निकालना॥
और इन सब से ज्यादा
अच्छा लगता है मुझे
तुम्हारा मासुम सा चेहरा;
और तुम
एक रात पुछा था मुझसे
मेरे उपर वाले ने
मैंने नींद मे ही तुम्हे सबसे खुबसुरत बताया था।
तभी से हर चीज मुझे
फिकी फिकी सी लगती है………सच।


--jalaj@sujeet--


Monday, January 13, 2014

मुश्किल होता है


किसी की याद को दिल में
छुपा कर रखना
कितना मुश्किल होता है।
रोने को दिल चाहने
पर भी न रोना यारों ऐसा
कितना मुश्किल होता है।
ख्वाहिश मेरी तोड़ लुँ
सारे ताल्लुकात इन
बेरहम शायरियों से,
पर शाम की तन्हाईयाँ गुजारना
कितना मुश्किल होता है।
ज़ाम का नशा तो नेअमत
कितना बेग़रुर होता है,
पर दिल से तेरा नशा उतारना
कितना मुश्किल होता है॥



--jalaj@sujeet--