मैंने अनेको के सपनो को सच होते देखा है सो मैंने भी सोचा की क्यों न मै भी अपने ख्वाब को शब्दों का आकार दूँ ,शायद सच हो जाएँ| पर दिल यही कहता है की अगर सच नहीं हो पाया तो .....मुश्किल है ....
खिज़ाँ पर लौटी थी बहार चंद दिनोँ के लिए ही । पर सुखी डाल पर कैसे सुनहले सुन्दर फुल अच्छे लगते , सो लौट गई सावन बादलोँ के पास । इस डाल को तोड़ कर बदरंग कर लहराती ,मंडराती अपनी उस खुशी के पास ............