Saturday, May 18, 2013

एक चकोर जो हुँ।

पूर्ण अमावस की रात से ही मैंने देखा है, उस चाँद को। हर रात बादलों से
लड़ते देखा है मैनें उस चाँद को। कोशिश की है मैने उसे ढुँढने की उस घनेरी
रात में जिसमे अपने साये का भी भरोसा नही होता।
पुरी दुनिया अँधेरे से दुर भाग, अपने घरोंदो में छुपे बैठे थे जब………… मैं
तब भी निकलता था आसमां में रोशनी की लकीरें ढुंढने।
कुछ टिमटिमाहट और घुप अँधेरा…………… पर आंखे तक रही है…… उपर अनंत आसमां की
ओर….. एक विश्वास है ये मेरा। एक चकोर जो हुँ।
मैने देखा है उसे हर पल बढ़ते हुए। एक जुगनू की रोशनी के मानिंद से…
कतरा-कतरा। और आज वो चांद पुरे फ़लक पर है । उसकी दुधिया रोशनी जग को नहला
रही है। अछुता हुँ तो बस मैं । एक चकोर जो हुँ।
मेरी आदत है बेसब्री से इन्तज़ार करना पूर्णिमा के चांद का। पर सह नही
सकता उसकी अथाह रोशनी । आँखे मेरी चकाचौंध हो गई………और मैं छुप गया। दुआ
है रहीम से मेरी, बरकरार रखे उनकी रोशनी। ताकि हर रात चुपके से ही सही ,
उनके खिलखिलाते अक़्स का दिदार हो मुझे………… आखिर एक चकोर जो हुँ।
--jalaj@sujeet--

Sunday, May 5, 2013

इन्सां जो हुँ।

लहरों की तरह बार-बार आस जगती है………उसके पास आने की। पर साहिल पर रखे
पत्थर कि तरह दिल पर एक चोट कर वापस लौट जाती है। कोशिश करता हुँ खुद को
संभालने की, उस चोट के बाद । पर मौका मिलता नहीं। एक के बाद एक, और कई
चोट खाने के बाद ताकत ही नही रहती संभलने की……………………आखिर इन्सां जो हुँ।
पर वो "निशान" इस बात की याद दिलाता रहता है…………मुन्तज़िर हो तुम, परवाह
नही तुझे खुद की। और उस अज्ञात प्रतिध्वनि के अदृश्य आदेश पर …ये आँखे
तकने लगती है फिर से………शुन्य में । आखिर इन्सां जो हुँ।
कहा था एक बार उसने मुझसे,"मुझे वापस आना है"। पर याद नही मुझे, शायद
उसने ये ख्वाब में बोला था।पर जारी है, मेरा वो कभी खत्म ना होने वाला
इन्तज़ार। हर ख्वाब को हक़िकत जो बनाना था मुझे। ऐसा मैं करता भी क्यों
नही? आखिर इन्सां जो हुँ॥

--jalaj@sujeet--