उस हर एक इन्सान के लिए जिसे वक्त ने पिछे कर दिया है
एक बस्ती थी जहाँ हर लोग हर मौसम का हर तरह से लुत्फ उठाते थे। काँटो के
भीतर छिपे जज्बात तक को समजने कि ताकत वहाँ के हरेक फूल मेँ थी।कहीँ
पराये नाम कि चिज वहाँ नजर नहीँ आती थी। भटका हुआ मुसाफिर वहाँ पहुँच कर
उसे अपना ही आशियाँ समझने लगता था।
वो एक बंद दरवाजा था जो कि हर किसी के लिए हर काम के लिए हर वक्त खुला रहता था।
वो एक खुली किताब थी जिसे प्रयास न करते हुए भी लोग एक नजर मेँ पढ लेते
थे। हर पंक्ति कठिन होते हुए भी पुरी किताब बिल्कुल सरल थी।
उस किताब कि एक पंक्ति थी .......
शायद आखिरी .....
........... बिल्कुल किताब के अन्त का
""पर भला कैसे कोई पत्थर खुदी से
शांत नदी की आंचल मेँ डुब जाए""
वह जज्बातक होने के साथ ही खुद भी एक जज्बात था ।जब सामने आता तो हजारोँ
के सपनोँ को साथ लेकर आता।।
पर अफसोस उस जज्बातक जज्बात के जज्बात को एक जज्बातक शख्स तक नहीँ समझ
सका।फलतः आज वो पुरी बस्ती वीरान है।कोई मौसम ही नही है वहाँ,तो बहार
कहाँ से हो सकती है। न कोई फूलोँ के खिलने का समाँ न काँटो के चुभन की
टीस।अब आज कोई भटका मुसाफिर वहाँ पहुँचता है ....तो पुरी बस्ती उसे वीरान
रेगिस्तान लगती है।तपते हुए सुरज के प्रभाव मेँ तपते हुए रेत से बहुत
जल्दी दूर निकल जाना चाहता है हर कोई।कल तक वह बस्ती सुहाने मौसम का
बसेरा था।पर आज वही भीतर ही भीतर तपता हुआ.....जलता हुआ ..... ईर्ष्या से
नही बल्कि इंतजार कि आग से ....उस बारिश के इंतजार मेँ .....जो शायद
दुबारा उस बस्ती को बसा सके।
यह विश्वास तो खुद मेरा भी है ...कि जो अपने पास हर किसी के लिए दो ईँच
जमीन रखता है ...अल्लाह उस सर दो ईँच मेँ बहार लाने को जरुर सोचेगा
।।।।।।।
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....sujeet@jalaj........
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