कितनी बहकी शमाँ थी ।
एक पल के लिए ये जहाँ ,ये जमीँ
सब थमीँ हुई थी ।
इस शमाँ मेँ मैँ और आप थे ,
एक दुसरे के करीब हम दोनो के करीब
हमदोनोँ मुस्कुरा रहे थे ।
हँसते हुए आपने कुछ कहा मुझसे
सुनना चाहा था मैँने पर
सुन सका न मैँ क्योँकि
मेरी आँख खुल चुकी थी ।
पल भर का ख्वाब हकिकत मेँ आया
सामने मेरे विरान जंगल और वहाँ अकेला मैँ ,
मेरी नीँद टुट चुकी थी ।
सुजीत कुमार "जलज"
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