Sunday, March 7, 2010

खिज़ाँ की बहार

खिज़ाँ पर लौटी थी बहार
चंद दिनोँ के लिए ही ।
पर सुखी डाल पर कैसे
सुनहले सुन्दर फुल अच्छे लगते ,
सो लौट गई सावन बादलोँ के पास ।
इस डाल को तोड़ कर
बदरंग कर
लहराती ,मंडराती
अपनी उस खुशी के पास ............


सुजीत कुमार "जलज"

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....jalaj@sujeet........

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