Wednesday, April 24, 2013

एक लम्बा इन्तज़ार

-- 30-40 गज से ज्यादा की दुरी नही होगी वो। हाँ ,दो लकिरें उसे आगे जाने
से रोकती है। एक खुबसुरत सा हरा भरा मैदान एक हाथ और दुसरी तरफ एक
खुबसुरत चिकित्सा विभाग। इन्हीं के बीच हर शाम …… मंद मंद कदमों से ना
जाने किन ख्यालों में गुम चलता है। उस लकीर से इस लकीर तक पहुँचने के बाद
उसकी आँखे कुछ बेचैन सी दिखती है। शायद किसी का इन्तज़ार हो उसे। पर यह
सोच कर ही मुझे झुरझुरी सी आ जाती है……… इन्तज़ार अगर इतना लंबा हो, तो
शायद मैं सही हुँ हर किसी को अपनी ज़िन्दगी से निकाल कर।
एक बार मैनें उसे दौड़ते देखा था। जल्दबाजी भरी थी उसके भीतर और इतना
बेताब वो पहली बार था। एक झलक उस चांद की मैनें भी देखी थी, जिसके लिये
वो दौड़ रहा था। वो चाँद उस तरह से दुबारा उस गली में कभी नही निकला। पर
उस आशिक़ का इन्तज़ार आज भी बरकरार है। उसे उम्मीद है कि यह चाँद अगली बार
उसकी गली में रौशन जरुर होगा॥

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