पूर्ण अमावस की रात से ही मैंने देखा है, उस चाँद को। हर रात बादलों से
लड़ते देखा है मैनें उस चाँद को। कोशिश की है मैने उसे ढुँढने की उस घनेरी
रात में जिसमे अपने साये का भी भरोसा नही होता।
पुरी दुनिया अँधेरे से दुर भाग, अपने घरोंदो में छुपे बैठे थे जब………… मैं
तब भी निकलता था आसमां में रोशनी की लकीरें ढुंढने।
कुछ टिमटिमाहट और घुप अँधेरा…………… पर आंखे तक रही है…… उपर अनंत आसमां की
ओर….. एक विश्वास है ये मेरा। एक चकोर जो हुँ।
मैने देखा है उसे हर पल बढ़ते हुए। एक जुगनू की रोशनी के मानिंद से…
कतरा-कतरा। और आज वो चांद पुरे फ़लक पर है । उसकी दुधिया रोशनी जग को नहला
रही है। अछुता हुँ तो बस मैं । एक चकोर जो हुँ।
मेरी आदत है बेसब्री से इन्तज़ार करना पूर्णिमा के चांद का। पर सह नही
सकता उसकी अथाह रोशनी । आँखे मेरी चकाचौंध हो गई………और मैं छुप गया। दुआ
है रहीम से मेरी, बरकरार रखे उनकी रोशनी। ताकि हर रात चुपके से ही सही ,
उनके खिलखिलाते अक़्स का दिदार हो मुझे………… आखिर एक चकोर जो हुँ।
--jalaj@sujeet--
लड़ते देखा है मैनें उस चाँद को। कोशिश की है मैने उसे ढुँढने की उस घनेरी
रात में जिसमे अपने साये का भी भरोसा नही होता।
पुरी दुनिया अँधेरे से दुर भाग, अपने घरोंदो में छुपे बैठे थे जब………… मैं
तब भी निकलता था आसमां में रोशनी की लकीरें ढुंढने।
कुछ टिमटिमाहट और घुप अँधेरा…………… पर आंखे तक रही है…… उपर अनंत आसमां की
ओर….. एक विश्वास है ये मेरा। एक चकोर जो हुँ।
मैने देखा है उसे हर पल बढ़ते हुए। एक जुगनू की रोशनी के मानिंद से…
कतरा-कतरा। और आज वो चांद पुरे फ़लक पर है । उसकी दुधिया रोशनी जग को नहला
रही है। अछुता हुँ तो बस मैं । एक चकोर जो हुँ।
मेरी आदत है बेसब्री से इन्तज़ार करना पूर्णिमा के चांद का। पर सह नही
सकता उसकी अथाह रोशनी । आँखे मेरी चकाचौंध हो गई………और मैं छुप गया। दुआ
है रहीम से मेरी, बरकरार रखे उनकी रोशनी। ताकि हर रात चुपके से ही सही ,
उनके खिलखिलाते अक़्स का दिदार हो मुझे………… आखिर एक चकोर जो हुँ।
--jalaj@sujeet--

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