Thursday, January 28, 2010

दीपक...... बुझ गए ।।

किसी ने कहा था उसे ,बेहद मुश्किल है,
जला कर रखना चिराग यादोँ के।
यह और भी बहुत मुश्किल है,
भुल जाओ वफ़ा किसी की फरियादोँ मेँ।
पर सोचा उसने जला कर ही रखुँगा मैँ ,
चिराग उसके वफा की यादोँ की।
पर एक तेज झोँका बुझा गया ,
मेरी उल्फत की यादोँ को ।।
उस दीपक की लो तो बुझ गई,
पर चिन्गारी बाकी है ।
वादा तो किया था लौटने का उसने
क्योँकि सारी जिन्दगी तो उसकी बाकी है।
यादोँ की चिन्गारी के सहारे
जिन्दगी गुजार लेगा वह अपनी ।
कोई सहारा उसका ना रहा ,
मिट गये सारे सहारे उसके ।।
क्योँकि ,वफा की ...यादोँ के ...
फरियादोँ के ......
दीपक ......बुझ गये ।

2 comments:

GeoEconomics said...

$ नितिश कुमार आर्य - काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, बनारस $

GeoEconomics said...

वाह सुजीत तुमने क्या कविता लिखी है. बहुत ही अच्छा और अपने किसी को याद करने का बहुत ही अच्छा तरीका.
तुम्हे शायद पता नहीं हो की मै तुम्हारे ब्लॉग को हमेशा ही देखता रहता हूँ और तुम्हारे नए पोस्ट का इंतजार करता रहता हूँ.मैंने तुमसे ही प्रेरणा लेकर कुछ लिखना शुरू किया है. तुम इसी तरह आगे भी लिखते रहना.