""अकेली पंछी""
""अकेली पंछी""वो अकेली उडती पंछी
गगन में कुलांचे भरती हुई,
कहती, ये पूरा गगन हमारा है|
ऊपर निचे दायें बाएं
सैर करती और कहती
ये पूरा आसमान हमारा है |
ना परवाह मुझे किसी की
ना मां की ना मेरे बाप की
ठोकर दोस्तों को मार, हंस कर
कहती ,ये जिंदगी हमारी है|
वो अकेली उडती पंछी .....
अकेले अकेले ही दिन भर उडती रही
और सबको सुनाती रही बड़े ही गर्व से
ये पूरी धरती ही हमारी है
बहुत खुश थी वो आज
पूरी दुनिया को यह बता कर
जिससे खुद
वो पूरी तरह अनज़ान थी
की वो आज अकेली है..|
शाम होते ही वो पंछी,
लौटी अपने आश्रय में
देखते ही अपने छोटे से घर को
चिल्ला कर जोश में बोली
आज ये इतनी बड़ी बिस्तर भी हमारी है||
थकी मांदी दिन भर की बेचारी
आँखें लग गयी मिनट भर में
पर जुबां से ये लफ्ज़ निकलते रहे,
ये नींद भी हमारी है
ये सपने भी हमारे है||
एक करवट बदलते ही उसे
याद आ गयी पिछली रात की
उसका पति अपनी बाहों में ले
बड़े प्यार से बोला था
जानू पूरी जिंदगी मै अपनी
तुम्हारे नाम करना चाहता हूँ
जीना चाहता हूँ मै तुम्हारे साथ
मरना चाहता हूँ मै तुम्हारे साथ इस बात पर न जाने क्यों,,
इस पंछी को आ गया था गुस्सा
कुछ जुमले बोल दिए थे उसने
सुनकर जिसे उसका पति सह नहीं पाया;
और वो वहीँ करवट लिए सोता ही रह गया
और ये पंछी बेपरवाह हो उड़ने चली गयी|
पर आज करवट बदलने पर
पूरा बिस्तर ही सुना मिला|
कोई नहीं था वहाँ ,जो
इसे अपनी बाहों में लेकर प्यार देता |
और तब जाकर ये पंछी बोलती
हाँ ये हसीं रात भी हमारी है||
एहसास हुआ इसे अपने अकेलेपन का,
रात के घोर सन्नाटे का
मेढक के टर्राने का,
और झींगुरों के मुंह चिढाने का|
तब ये अकेली पंछी
आँखों में लोरें भरे हुए
सिसकते हुए बोली....
हाँ ये तन्हाई भी हमारी है
ये अश्क भी हमारा है|
पर एहसास है मुझे अपनी भूल का...
बस...बस... लौटा दो उसे कोई
वो प्यार भी हमारा है|
वो प्यारा भी हमारा है|||
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....jalaj@sujeet........
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....jalaj@sujeet........

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