तेरी यादों मी डूब कर मुझे ये जमाना भुलाना अच्छा लगता है
दबी है चिंगारिया दिल में मेरे पर मुस्कुराना अच्छा लगता है |
मेरे इस गुनाह का किसी से कोई शिकवा नहीं है पर
कभी कभी तो मुझे आपका मुजरिम बनना भी अच्छा लगता है||
ये क्या हुआ आपको ,मेरे शीशे का महल पसंद नहीं आया
खैर अब तो मुझे रेत पर रेत का महल बनाना भी अच्छा लगता है|||
दिल के जेहन में रखा है छुपा कर नाम तेरा
इन लहरों को तो साहिल पर लिखा नाम मिटाना भी अच्छा लगता है||||
अश्क -ऐ-महफ़िल उदास "जलज" करे तो क्या करे तुम बिन
चुप चुप कर अश्क बहाना भी इन्हें बहुत अच्छा लगता है|||||
--
....jalaj@sujeet........
दबी है चिंगारिया दिल में मेरे पर मुस्कुराना अच्छा लगता है |
मेरे इस गुनाह का किसी से कोई शिकवा नहीं है पर
कभी कभी तो मुझे आपका मुजरिम बनना भी अच्छा लगता है||
ये क्या हुआ आपको ,मेरे शीशे का महल पसंद नहीं आया
खैर अब तो मुझे रेत पर रेत का महल बनाना भी अच्छा लगता है|||
दिल के जेहन में रखा है छुपा कर नाम तेरा
इन लहरों को तो साहिल पर लिखा नाम मिटाना भी अच्छा लगता है||||
अश्क -ऐ-महफ़िल उदास "जलज" करे तो क्या करे तुम बिन
चुप चुप कर अश्क बहाना भी इन्हें बहुत अच्छा लगता है|||||
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