Tuesday, July 2, 2013

बेबस मजदुर माँ

अपनी इस नयी खिड़की से जब भी बाहर देखता हुँ, तो बहुत कुछ दिखता है मुझे । पर नज़रें टिकी रह जाती है उन लोगों के उपर जिनपर शायद ही किसी की निगाह जाती होगी ।

हर बार अपने सपनों के बदले 
गिनती के दस ईंटों को
सिर पर ढ़ोते हुए
मैनें देखा है ।
उस औरत को,
जिसकी छाती से चिपका है
एक मरणासन्न शिशु
और दुसरा…………
फुले हुए पेट ,कमजोर टांगो से
चलता हुआ, अपनी माँ के साथ ।
लोरें बहाते ,बिना कुछ बोले
कहता ,”
मैया, हमरा के कुछो खायऽऽ लऽ देब

--jalaj@sujeet--

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