अभी भी आती है याद तेरी
कर देती है उदास मेरे हलक को।
बाध्य करती है आँसुओं को
बहक जाने को
एक तुफानी लहर बन
तट पर आ जाने को॥
और सुखे मटमैले पड़े जमीं को
फिर से भिंगो जाती है।
मचल जाते हैं मेरे ज़ज़्बात
उमड़ पड़ती है कसक
तुम्हें फिर करीब से देखने को
अपनी बाँहो में भर लेने को॥
पर भला कैसे कोई पत्थर खुदी से
शांत नदी की आँचल में डुब जाए॥॥
--
....jalaj@sujeet........
कर देती है उदास मेरे हलक को।
बाध्य करती है आँसुओं को
बहक जाने को
एक तुफानी लहर बन
तट पर आ जाने को॥
और सुखे मटमैले पड़े जमीं को
फिर से भिंगो जाती है।
मचल जाते हैं मेरे ज़ज़्बात
उमड़ पड़ती है कसक
तुम्हें फिर करीब से देखने को
अपनी बाँहो में भर लेने को॥
पर भला कैसे कोई पत्थर खुदी से
शांत नदी की आँचल में डुब जाए॥॥
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