Sunday, May 5, 2013

इन्सां जो हुँ।

लहरों की तरह बार-बार आस जगती है………उसके पास आने की। पर साहिल पर रखे
पत्थर कि तरह दिल पर एक चोट कर वापस लौट जाती है। कोशिश करता हुँ खुद को
संभालने की, उस चोट के बाद । पर मौका मिलता नहीं। एक के बाद एक, और कई
चोट खाने के बाद ताकत ही नही रहती संभलने की……………………आखिर इन्सां जो हुँ।
पर वो "निशान" इस बात की याद दिलाता रहता है…………मुन्तज़िर हो तुम, परवाह
नही तुझे खुद की। और उस अज्ञात प्रतिध्वनि के अदृश्य आदेश पर …ये आँखे
तकने लगती है फिर से………शुन्य में । आखिर इन्सां जो हुँ।
कहा था एक बार उसने मुझसे,"मुझे वापस आना है"। पर याद नही मुझे, शायद
उसने ये ख्वाब में बोला था।पर जारी है, मेरा वो कभी खत्म ना होने वाला
इन्तज़ार। हर ख्वाब को हक़िकत जो बनाना था मुझे। ऐसा मैं करता भी क्यों
नही? आखिर इन्सां जो हुँ॥

--jalaj@sujeet--

1 comment:

Anonymous said...

Nice!! :)